भक्ति और परंपरा

श्रीराणी सतीजी के सिद्ध, जय, बीज मंत्र

सिद्ध मंत्र (ध्यान मंत्र)

या देवी सर्वभूतेषु, सती रूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै, नारायणी नमो नमः ॥

जय मंत्र

भगवती श्री राणी सतीये नमः

साधक इस मंत्र का सवा लाख जप के पश्चात बीज मंत्र जपने का अधिकारी हो जाता है।

बीज मंत्र

ॐ क्लीं श्री राणी सतीये नमः

जप-विधि

इस मंत्र को ऊनी या कुशा के आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके एक ही नियत समय पर श्रद्धा, विश्वासपूर्वक नियम से जप करके साधक सर्व-सिद्धियाँ प्राप्त कर सकता है।

सामग्री :- चित्र, रोली, चावल, पुष्प, दीपक, प्रसाद, कमलगट्टे की माला।

पूर्वजों का सम्मान • आने वाली पीढ़ियों की धरोहर

वंश परिचय

देवड़ा वंशावली

अग्रवंश की गौरवशाली परंपरा, गोत्रों का परिचय और देवड़ा परिवार की पीढ़ियों को एक सुरक्षित डिजिटल स्थान पर संजोने का प्रयास।

“अपने वंश और पूर्वजों का परिचय हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और आने वाली पीढ़ियों को संस्कारों की पहचान देता है।”
देवड़ा वंशावली का आधिकारिक प्रतीक
श्री राणी सतीजी का पारंपरिक प्रतीक

वंशावली में सुरक्षित पारंपरिक आख्यान

श्री राणी सतीजी का संक्षिप्त परिचय

देवड़ा वंशावली के पृष्ठ ४–५ में प्रकाशित विवरण को पढ़ने योग्य रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह उसी ग्रंथ में वर्णित धार्मिक एवं पारिवारिक परंपरा का सार है।

वंशावली में श्री राणी सतीजी को कलिकाल में भक्तों के भय और संकट दूर करने वाली, सुख प्रदान करने वाली, भक्तवत्सला तथा दुर्गास्वरूपा देवी के रूप में स्मरण किया गया है। इसमें कहा गया है कि भारतवर्ष के अनेक श्रद्धालु उनकी पूजा-आराधना करते हैं और उनकी महिमा तथा गुणों का पूरा वर्णन साधारण मनुष्य के लिए संभव नहीं। नीचे उसी पुस्तक में उपलब्ध जीवन-चरित्र का संक्षिप्त कथानक दिया गया है।

महाभारत से जुड़ी लोक-परंपरा

इस आख्यान की शुरुआत द्वापर युग के महाभारत प्रसंग से होती है। अभिमन्यु के चक्रव्यूह में वीरगति पाने के बाद उनकी पत्नी उत्तरा सती होना चाहती थीं। उस समय वे गर्भवती थीं; श्रीकृष्ण ने उन्हें ऐसा करने से रोका और आशीर्वाद दिया कि कलियुग में उनकी यह इच्छा पूर्ण होगी तथा वे पूजित होंगी। वंशावली इस आशीर्वाद को नारायणीजी के रूप में अभिमन्यु से पुनर्मिलन की परंपरा से जोड़ती है।

नारायणीजी का जन्म और विवाह

पुस्तक के अनुसार नारायणीजी का जन्म हरियाणा के महम (डोकवा) ग्राम में गोयल गोत्रीय श्री गुरुसामलजी के घर कार्तिक शुक्ल नवमी को हुआ। वे उनकी इकलौती पुत्री थीं और उनका नाम नारायणी रखा गया। उनका विवाह हिसार निवासी सेठ श्री जालिरामजी के ज्येष्ठ पुत्र श्री तनधनदासजी से हुआ। पुस्तक विवाह का दिन मंगसिर सुदी नवमी, विक्रम संवत १२५१, मंगलवार बताती है।

घोड़ी की घटना और हिसार से प्रस्थान

वंशावली बताती है कि तनधनदासजी के पास एक सुंदर और तेज़ घोड़ी थी। नवाब के शहज़ादे की नज़र उस पर पड़ी और वह उसे पाने के लिए उतावला हुआ। एक रात घोड़ी चुराने की कोशिश में तनधनदासजी ने अपने भाले से वार किया और शहज़ादे की मृत्यु हो गई। घटना से भयभीत होकर सेठ जालिरामजी रातों-रात हिसार छोड़कर झुंझुनू चले आए। पुस्तक उन्हें हिसार राज्य का दीवान और नवाब झुंडचंद का घनिष्ठ मित्र भी बताती है।

युद्ध और झुंझुनू का तीर्थ

आगे के वर्णन में जालिरामजी और तनधनदासजी के नारायणीजी को लिवाने डोकवा जाने तथा लौटते समय जंगल में नवाब की सेना द्वारा घेर लिए जाने का प्रसंग है। भीषण युद्ध में तनधनदासजी, जालिरामजी और उनके अनेक साथी वीरगति को प्राप्त हुए। आख्यान के अनुसार नारायणीजी ने चंडिका रूप धारण कर नवाब की सेना का सामना किया; शेष सेना भाग गई। इसके बाद वे सती हुईं। पुस्तक कहती है कि उनकी घोड़ी जहाँ रुकी, झुंझुनू में उसी पवित्र स्थान पर सती दादी का मंदिर बना, जो आगे चलकर तीर्थस्थल के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

यह परिचय उपलब्ध वंशावली में वर्णित श्रद्धा-परंपरा का सार है; कथा और तिथियां उसी प्रकाशित विवरण के अनुसार रखी गई हैं।

17½

मूल गोत्रों की परंपरा

78

वर्णित पारिवारिक शाखाएँ

7

देवड़ा वंश की उपशाखाएँ

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

महाराजा अग्रसेन और अग्रवंश

एक ऐसी परंपरा जिसका आधार धर्म, अहिंसा, सामाजिक समानता और पीढ़ियों के बीच जुड़ाव है।

परंपरा के अनुसार सूर्यवंशी महाराजा अग्रसेन प्रतापनगर के राजा वल्लभसेन के पुत्र थे। उनके शासन और सामाजिक व्यवस्था को न्याय, समृद्धि और लोककल्याण के लिए स्मरण किया जाता है।

यज्ञ में पशुबलि देखकर उन्होंने अहिंसा का मार्ग अपनाया और अंतिम यज्ञ को अधूरा छोड़ दिया। इसी कारण अग्रवंश में साढ़े सत्रह यज्ञों से साढ़े सत्रह गोत्र स्थापित होने की मान्यता है।

अग्रवंश की पहचान

साढ़े सत्रह गोत्र

परंपरा के अनुसार महाराजा अग्रसेन के यज्ञों से अग्रवंश के साढ़े सत्रह गोत्रों की स्थापना मानी जाती है।

1गर्ग
2गोभिल
3गौतम
4मैत्रेय
5जैमिनी
6शाण्डिल्य
7वत्स
8और्व
9कौशिक
10कश्यप
11तांड्य
12मांडव्य
13वाशिष्ठ्य
14धौम्य
15मुद्गल
16धान्यासा
17तैत्तिरीय
18नागेन्द्र

जालान और देवड़ा शाखा

वंश-परिचय के अनुसार गर्ग गोत्रीय परिवारों में जालान नाम की उत्पत्ति जालना नगरी से मानी जाती है। समय के साथ इस वंश से अनेक शाखाएँ विकसित हुईं।

देवड़ा शाखा के नामकरण का संबंध वंश के सातवें क्रम में आए दयारामजी से बताया गया है। परंपरा में देवड़ा वंश की सात प्रमुख उपशाखाओं का उल्लेख मिलता है।

ताराभोपतकाजैतावतकल्लू बल्लूकाविशनकासुन्दरदासकाउदयरामकाहरखदासका

निवास और कुल-परंपरा

परिवार का मूल स्थान फतेहपुर (शेखावाटी) बताया गया है। बाद की पीढ़ियाँ लक्ष्मणगढ़ और मंडावा सहित अन्य स्थानों पर जाकर बसीं।

कुल-पुरोहित खेडवाल ब्राह्मण माने गए हैं। परंपरा में सामवेद, कौथुमी शाखा, गोभिल सूत्र तथा पाँच प्रवरों का उल्लेख है।

परिवार का विस्तार

अठहत्तर प्रमुख शाखाएँ

मूल वंश-परिचय में उल्लिखित शाखाओं को क्रमबद्ध और पठनीय रूप में प्रस्तुत किया गया है।

1.जालान
2.तुलस्यान
3.रामदासका
4.जैतीरामका
5.दामोदरदासका
6.चन्द्रसेनका
7.झुंझुनू-वाला
8.बांकेसरिया
9.समर्थरायका
10.परमानन्दका
11.नागरदासका
12.भज्जूरामका
13.दयारामका
14.भोजराजका
15.मंगलरामका
16.सुन्दरसेनका
17.ताराभोपतका
18.कल्लू बल्लूका
19.सुन्दरदासका
20.उदयरामका
21.हरखदासका
22.लूणकरणका
23.टोडरमलका
24.उडेका
25.कनकसिंहका
26.कांकरका
27.वाछूका
28.शरणका
29.शिवचन्दका
30.फतहचन्दका
31.चौधरी
32.नोपरायका
33.टांडवाला
34.नोपानी
35.कटारका
36.नेमानी
37.जटिया
38.कुड़कुड़ीवाला
39.रइया
40.पतासिया
41.विशनका
42.नागसरिया
43.मोदी
44.नूनवागला
45.पाटोदिया
46.बूबना
47.मस्करा
48.जलेबीचोर
49.मुसाणिया
50.टंसारी
51.छाजूका
52.कनौई
53.तपसी
54.वठारिया
55.नवलपुरिया
56.पिपलीवाला
57.कालूंडवाला
58.महजनिया
59.गालड़ीवाला
60.नागड़
61.मलकीसरिया
62.करेवाला
63.कालिनसरिया
64.लूड़िया
65.सुलतानिया
66.टमकोरिया
67.गिन्दौड़िया
68.कराल
69.देवड़ा
70.कठारसका
71.महलवाला
72.मोड़ा
73.गींदूरामका
74.मदूरिया
75.मलानूरका
76.हालण
77.कनबोलिया
78.काननसरिया
DEORA VANSHAVALI

Our roots, our shared legacy

We often hear, “What Is There In The Name,” but at the same time great saints like Goswami Tulsidasji have stated, “Dekhiahin roop naam adhina, roop gyan nahin naam adhina.” Your face, physical appearance, or position is under the control of your name, and not vice versa. Anybody can recognise a person when their name is mentioned.

It is said that a tree’s strength depends on the depth of its roots. This Vanshavali not only tells us the names of our co-brothers and community partners, but also introduces us to our roots. Very extensive and determined efforts have been made to give the Vanshavali this shape. It provides us with our lineage and tells us where we have come from, who we are, and what the vision and mission of our ancestors have been.

Our ancestors have handed over a fully grown, strong tree, well rooted in history. We have the responsibility not only to protect it but to help it grow further and ensure that its fruits serve the community at large.

This can happen only if we all remain in touch and communicate with each other freely and without any hesitation. Only then will the purpose of making this Vanshavali be properly served. If we show this unity, we shall contribute greatly to fulfilling the dreams of our ancestors and making them proud.

Wishing the very best to all family members.

Deokinandan Deora

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